श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

नवैकादश पंच त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै।

ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्‍चितम्॥ १४

navaikādaśa paṃca trīn bhāvān bhūteṣu yena vai|

īkṣetāthaikamapyeṣu tajjñānaṃ mama niścitam|| 14

अर्थ

उद्धवजी! जिस ज्ञानसे प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्रा—ये नौ, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन—ये ग्यारह, पाँच महाभूत और तीन गुण अर्थात् इन अट्ठाईस तत्त्वोंको ब्रह्मासे लेकर तृणतक सम्पूर्ण कार्योंमें देखा जाता है और इनमें भी एक परमात्मतत्त्वको अनुगत रूपसे देखा जाता है—वह परोक्षज्ञान है, ऐसा मेरा निश्‍चय है॥ १४॥✎ 1753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1753 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा—ये → पंचतन्मात्रा—ये

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