श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

पुंसः किंस्विद् बलं श्रीमन् भगो लाभश्‍च केशव।

का विद्या ह्रीः परा का श्रीः किं सुखं दुःखमेव च॥ ३०✎ 1223

puṃsaḥ kiṃsvid balaṃ śrīman bhago lābhaśca keśava|

kā vidyā hrīḥ parā kā śrīḥ kiṃ sukhaṃ duḥkhameva ca|| 30

अर्थ

श्रीमान् केशव! पुरुषका सच्चा बल क्या है? भग किसे कहते हैं? और लाभ क्या वस्तु है? उत्तम विद्या, लज्जा, श्री तथा सुख और दुःख क्या है?॥ ३०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1223 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृ: → ह्रीः

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