श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

किं दानं किं तपः शौर्यं किं सत्यमृतमुच्यते।

कस्त्यागः किं धनं चेष्टं को यज्ञः का च दक्षिणा॥ २९

kiṃ dānaṃ kiṃ tapaḥ śauryaṃ kiṃ satyamṛtamucyate|

kastyāgaḥ kiṃ dhanaṃ ceṣṭaṃ ko yajñaḥ kā ca dakṣiṇā|| 29

अर्थ

आप मुझे दान, तपस्या, शूरता, सत्य और ऋतका भी स्वरूप बतलाइये। त्याग क्या है? अभीष्ट धन कौन-सा है? यज्ञ किसे कहते हैं? और दक्षिणा क्या वस्तु है?॥ २९॥

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