श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अव्याहतेष्टगतयः सुरसिद्धसाध्य-

गन्धर्वयक्षनरकिन्‍नरनागलोकान्।

मुक्ताश्‍चरन्ति मुनिचारणभूतनाथ-

विद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम्॥ २३

avyāhateṣṭagatayaḥ surasiddhasādhya-

gandharvayakṣanarakinnaranāgalokān|

muktāścaranti municāraṇabhūtanātha-

vidyādharadvijagavāṃ bhuvanāni kāmam|| 23

अर्थ

उनके लिये कहीं भी रोक-टोक न थी। वे जहाँ चाहते, चले जाते। देवता, सिद्ध, साध्य-गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, किन्‍नर और नागोंके लोकोंमें तथा मुनि, चारण, भूतनाथ, विद्याधर, ब्राह्मण और गौओंके स्थानोंमें वे स्वच्छन्द विचरते थे। वसुदेवजी! वे सब-के-सब जीवन्मुक्त थे॥ २३॥✎ 1907

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1907 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्वछन्द → स्वच्छन्द

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