॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.23
अव्याहतेष्टगतयः सुरसिद्धसाध्य-
गन्धर्वयक्षनरकिन्नरनागलोकान्।
मुक्ताश्चरन्ति मुनिचारणभूतनाथ-
विद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम्॥ २३
avyāhateṣṭagatayaḥ surasiddhasādhya-
gandharvayakṣanarakinnaranāgalokān|
muktāścaranti municāraṇabhūtanātha-
vidyādharadvijagavāṃ bhuvanāni kāmam|| 23
अर्थ
उनके लिये कहीं भी रोक-टोक न थी। वे जहाँ चाहते, चले जाते। देवता, सिद्ध, साध्य-गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, किन्नर और नागोंके लोकोंमें तथा मुनि, चारण, भूतनाथ, विद्याधर, ब्राह्मण और गौओंके स्थानोंमें वे स्वच्छन्द विचरते थे। वसुदेवजी! वे सब-के-सब जीवन्मुक्त थे॥ २३॥✎ 1907