॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.43
इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्त्या ✎ 1214
भक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोधः ।
भवन्ति वै भागवतस्य राजं-
स्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात्॥ ४३
ityacyutāṅghriṃ bhajato'nuvṛttyā
bhaktirviraktirbhagavatprabodhaḥ |
bhavanti vai bhāgavatasya rājaṃ-
stataḥ parāṃ śāntimupaiti sākṣāt|| 43
अर्थ
राजन्! इस प्रकार जो प्रतिक्षण एक-एक वृत्तिके द्वारा भगवान्के चरणकमलोंका ही भजन करता है, उसे भगवान्के प्रति प्रेममयी भक्ति, संसारके प्रति वैराग्य और अपने प्रियतम भगवान्के स्वरूपकी स्फूर्ति—ये सब अवश्य ही प्राप्त होते हैं; वह भागवत हो जाता है और जब ये सब प्राप्त हो जाते हैं, तब वह स्वयं परम शान्तिका अनुभव करने लगता है॥ ४३॥