श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

राजोवाच

अथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मो यादृशो नृणाम्।

यथा चरति यद् ब्रूते यैर्लिङ्गैर्भगवत्प्रियः॥ ४४

atha bhāgavataṃ brūta yaddharmo yādṛśo nṛṇām|

yathā carati yad brūte yairliṅgairbhagavatpriyaḥ|| 44

अर्थ

राजा निमिने पूछा—योगीश्‍वर! अब आप कृपा करके भगवद्भक्तका लक्षण वर्णन कीजिये। उसके क्या धर्म हैं? और कैसा स्वभाव होता है? वह मनुष्योंके साथ व्यवहार करते समय कैसा आचरण करता है? क्या बोलता है? और किन लक्षणोंके कारण भगवान्‌का प्यारा होता है?॥ ४४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें