श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

हरिरुवाच

सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः।

भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥ ४५

sarvabhūteṣu yaḥ paśyed bhagavadbhāvamātmanaḥ|

bhūtāni bhagavatyātmanyeṣa bhāgavatottamaḥ|| 45

अर्थ

अब नौ योगीश्‍वरोंमेंसे दूसरे हरिजी बोले—राजन्! आत्मस्वरूप भगवान् समस्त प्राणियोंमें आत्मारूपसे—नियन्तारूपसे स्थित हैं। जो कहीं भी न्यूनाधिकता न देखकर सर्वत्र परिपूर्ण भगवत्सत्ताको ही देखता है और साथ ही समस्त प्राणी और समस्त पदार्थ आत्मस्वरूप भगवान्‌में ही आधेयरूपसे अथवा अध्यस्तरूपसे स्थित हैं, अर्थात् वास्तवमें भगवत्स्वरूप ही हैं—इस प्रकारका जिसका अनुभव है, ऐसी जिसकी सिद्ध दृष्टि है, उसे भगवान्‌का परमप्रेमी उत्तम भागवत समझना चाहिये॥ ४५॥

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