प्रिय उद्धव! जब पुरुष दोषदर्शनके कारण कर्मोंसे उद्विग्न और विरक्त हो जाय, तब जितेन्द्रिय होकर वह योगमें स्थित हो जाय और अभ्यास—आत्मानुसन्धानके द्वारा अपना मन मुझ परमात्मामें निश्चलरूपसे धारण करे॥ १८॥✎ 1754
यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्तः संयतेन्द्रियः।
अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मनः॥ १८
प्रिय उद्धव! जब पुरुष दोषदर्शनके कारण कर्मोंसे उद्विग्न और विरक्त हो जाय, तब जितेन्द्रिय होकर वह योगमें स्थित हो जाय और अभ्यास—आत्मानुसन्धानके द्वारा अपना मन मुझ परमात्मामें निश्चलरूपसे धारण करे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 836) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)