जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर-उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानीसे उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वशमें कर ले॥ १९॥✎ 1754
धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम्।
अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥ १९
जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर-उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानीसे उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वशमें कर ले॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 836) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)