श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यदि कुर्यात् प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम्।

योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन॥ २५

yadi kuryāt pramādena yogī karma vigarhitam|

yogenaiva dahedaṃho nānyattatra kadācana|| 25

अर्थ

उद्धवजी! वैसे तो योगी कभी कोई निन्दित कर्म करता ही नहीं; परन्तु यदि कभी उससे प्रमादवश कोई अपराध बन जाय तो योगके द्वारा ही उस पापको जला डाले, कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि दूसरे प्रायश्‍चित्त कभी न करे॥ २५॥

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