॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.20.26
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।
कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियमः कृतः।
गुणदोषविधानेन संगानां त्याजनेच्छया॥ २६
sve sve'dhikāre yā niṣṭhā sa guṇaḥ parikīrtitaḥ|
karmaṇāṃ jātyaśuddhānāmanena niyamaḥ kṛtaḥ|
guṇadoṣavidhānena saṃgānāṃ tyājanecchayā|| 26
अर्थ
अपने-अपने अधिकारमें जो निष्ठा है, वही गुण कहा गया है। इस गुण-दोष और विधि-निषेधके विधानसे यही तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषयासक्तिका परित्याग हो जाय; क्योंकि कर्म तो जन्मसे ही अशुद्ध हैं, अनर्थके मूल हैं। शास्त्रका तात्पर्य उनका नियन्त्रण, नियम ही है। जहाँतक हो सके प्रवृत्तिका संकोच ही करना चाहिये॥ २६॥