॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.20.3
गुणदोषभिदादृष्टिमन्तरेण वचस्तव।
निःश्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम्॥ ३
guṇadoṣabhidādṛṣṭimantareṇa vacastava|
niḥśreyasaṃ kathaṃ nṝṇāṃ niṣedhavidhilakṣaṇam|| 3
अर्थ
इसमें सन्देह नहीं कि आपकी वाणी ही वेद है, परन्तु उसमें विधि-निषेध ही तो भरा पड़ा है। यदि उसमें गुण और दोषमें भेद करनेवाली दृष्टि न हो, तो वह प्राणियोंका कल्याण करनेमें समर्थ ही कैसे हो?॥ ३॥