श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।

वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्‍वसन्॥ २२

viṣayābhiniveśena nātmānaṃ veda nāparam|

vṛkṣajīvikayā jīvan vyarthaṃ bhastreva yaḥ śvasan|| 22

अर्थ

विषयोंका चिन्तन करते-करते वह विषयरूप हो जाता है। उसका जीवन वृक्षोंके समान जड हो जाता है। उसके शरीरमें उसी प्रकार व्यर्थ श्‍वास चलता रहता है, जैसे लुहारकी धौंकनीकी हवा। उसे न अपना ज्ञान रहता है और न किसी दूसरेका। वह सर्वथा आत्म-वञ्चित हो जाता है॥ २२॥✎ 1758

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1758 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: चेतना-शक्ति → चेतनाशक्ति

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