श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21

43 श्लोक · 1 टिप्पणियाँ · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 838–845

श्लोक-सूची
पृष्ठ 839

य एतान् मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान्।

क्षुद्रान् कामांश्‍चलैः प्राणैर्जुषन्तः संसरन्ति ते॥ १11.21.1

स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।

विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्‍चयः॥ २11.21.2

शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।

द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ॥ ३11.21.3

धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।

दर्शितोऽयं मयाऽऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम्॥ ४11.21.4

भूम्यम्ब्व‌ग्‍न्यनिलाकाशा भूतानां पंच धातवः।

आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुताः॥ ५11.21.5

वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि।

धातुषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये॥ ६ 11.21.6

पृष्ठ 840

देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।

गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम्॥ ७11.21.7

अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत्।

कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणम्॥ ८11.21.8

कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।

यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः॥ ९11.21.9

द्रव्यस्य शुद्ध्यशुद्धी च द्रव्येण वचनेन च।

संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा॥ १०11.21.10

शक्त्याशक्त्याथवा बुद्ध्या समृद्ध्या च यदात्मने।

अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारतः॥ ११11.21.11

पृष्ठ 838

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! मेरी प्राप्तिके तीन मार्ग हैं—भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग। जो इन्हें छोड़कर चंचल इन्द्रियोंके द्वारा क्षुद्र भोग भोगते रहते हैं, वे बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १॥ अपने-अपने अधिकारके अनुसार धर्ममें दृढ़ निष्ठा रखना ही गुण कहा गया है और इसके विपरीत अनधिकार चेष्टा करना दोष है। तात्पर्य यह कि गुण और दोष दोनोंकी व्यवस्था अधिकारके अनुसार की जाती है, किसी वस्तुके अनुसार नहीं॥ २॥ वस्तुओंके समान होनेपर भी शुद्धि-अशुद्धि, गुण-दोष और शुभ-अशुभ आदिका जो विधान किया जाता है, उसका अभिप्राय यह है कि पदार्थका ठीक-ठीक निरीक्षण-परीक्षण हो सके और उनमें सन्देह उत्पन्‍न करके ही यह योग्य है कि अयोग्य, स्वाभाविक प्रवृत्तिको नियन्त्रित—संकुचित किया जा सके॥ ३॥ उनके द्वारा धर्म-सम्पादन कर सके, समाजका व्यवहार ठीक-ठीक चला सके और अपने व्यक्तिगत जीवनके निर्वाहमें भी सुविधा हो। इससे यह लाभ भी है कि मनुष्य अपनी वासनामूलक सहज प्रवृत्तियोंके द्वारा इनके जालमें न फँसकर शास्त्रानुसार अपने जीवनको नियन्त्रित और मनको वशीभूत कर लेता है। निष्पाप उद्धव! यह आचार मैंने ही मनु आदिका रूप धारण करके धर्मका भार ढोनेवाले कर्म जडोंके लिये उपदेश किया है॥ ४॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचभूत ही ब्रह्मासे लेकर पर्वत-वृक्षपर्यन्त सभी प्राणियोंके शरीरोंके मूलकारण हैं। इस तरह वे सब शरीरकी दृष्टिसे तो समान हैं ही, सबका आत्मा भी एक ही है॥ ५॥ प्रिय उद्धव! यद्यपि सबके शरीरोंके पंचभूत समान हैं, फिर भी वेदोंने इनके वर्णाश्रम आदि अलग-अलग नाम और रूप इसलिये बना दिये हैं कि ये अपनी वासना-मूलक प्रवृत्तियोंको संकुचित करके—नियन्त्रित करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको सिद्ध कर सकें॥ ६॥ साधुश्रेष्ठ! देश, काल, फल, निमित्त, अधिकारी और धान्य आदि वस्तुओंके गुण-दोषोंका विधान भी मेरे द्वारा इसीलिये किया गया है कि कर्मोंमें लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्ति न हो, मर्यादाका भंग न होने पावे॥ ७॥ देशोंमें वह देश अपवित्र है, जिसमें कृष्णसार मृग न हों और जिसके निवासी ब्राह्मण-भक्त न हों। कृष्णसार मृगके होनेपर भी, केवल उन प्रदेशोंको छोड़कर जहाँ संत पुरुष रहते हैं, कीकट देश अपवित्र ही है। संस्काररहित और ऊसर आदि स्थान भी अपवित्र ही होते हैं॥ ८॥ समय वही पवित्र है, जिसमें कर्म करनेयोग्य सामग्री मिल सके तथा कर्म भी हो सके। जिसमें कर्म करनेकी सामग्री न मिले, आगन्तुक दोषोंसे अथवा स्वाभाविक दोषके कारण जिसमें कर्म ही न हो सके, वह समय अशुद्ध है॥ ९॥ पदार्थोंकी शुद्धि और अशुद्धि द्रव्य, वचन, संस्कार, काल, महत्त्व अथवा अल्पत्वसे भी होती है। (जैसे कोई पात्र जलसे शुद्ध और मूत्रादिसे अशुद्ध हो जाता है। किसी वस्तुकी शुद्धि अथवा अशुद्धिमें शंका होनेपर ब्राह्मणोंके वचनसे वह शुद्ध हो जाती है अन्यथा अशुद्ध रहती है। पुष्पादि जल छिड़कनेसे शुद्ध और सूँघनेसे अशुद्ध माने जाते हैं। तत्कालका पकाया हुआ अन्‍न शुद्ध और बासी अशुद्ध माना जाता है। बड़े सरोवर और नदी आदिका जल शुद्ध और छोटे गड्ढोंका अशुद्ध माना जाता है। इस प्रकार क्रमसे समझ लेना चाहिये।)॥ १०॥ शक्ति, अशक्ति, बुद्धि और वैभवके अनुसार भी पवित्रता और अपवित्रताकी व्यवस्था होती है। उसमें भी स्थान और उपयोग करनेवालेकी आयुका विचार करते हुए ही अशुद्ध वस्तुओंके व्यवहारका दोष ठीक तरहसे आँका जाता है। (जैसे धनी-दरिद्र, बलवान्-निर्बल, बुद्धिमान्-मूर्ख, उपद्रवपूर्ण और सुखद देश तथा तरुण एवं वृद्धावस्थाके भेदसे शुद्धि और अशुद्धिकी व्यवस्थामें अन्तर पड़ जाता है।)॥ ११॥✎ 1756 1757

धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।

कालवाय्वग्‍निमृत्तोयैः पार्थिवानां युतायुतैः॥ १२ 11.21.12

पृष्ठ 841

अमेध्यलिप्तं यद् येन गन्धं लेपं व्यपोहति।

भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते॥ १३11.21.13

स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।

मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः॥ १४11.21.14

मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम्।

धर्मः सम्पद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्ययः॥ १५11.21.15

क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।

गुणदोषार्थनियमस्तद्भिदामेव बाधते॥ १६11.21.16

समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।

औत्पत्तिको गुणः संगो न शयानः पतत्यधः॥ १७11.21.17

यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।

एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥ १८11.21.18✎ 1227

पृष्ठ 840

अनाज, लकड़ी, हाथीदाँत आदि हड्डी, सूत, मधु, नमक, तेल, घी आदि रस, सोना-पारा आदि तैजस पदार्थ, चाम और घड़ा आदि मिट्टीके बने पदार्थ समयपर अपने-आप हवा लगनेसे, आगमें जलानेसे, मिट्टी लगानेसे अथवा जलमें धोनेसे शुद्ध हो जाते हैं। देश, काल और अवस्थाके अनुसार कहीं जल-मिट्टी आदि शोधक सामग्रीके संयोगसे शुद्धि करनी पड़ती है तो कहीं-कहीं एक-एकसे भी शुद्धि हो जाती है॥ १२॥ यदि किसी वस्तुमें कोई अशुद्ध पदार्थ लग गया हो तो छीलनेसे या मिट्टी आदि मलनेसे जब उस पदार्थकी गन्ध और लेप न रहे और वह वस्तु अपने पूर्वरूपमें आ जाय, तब उसको शुद्ध समझना चाहिये॥ १३॥ स्नान, दान, तपस्या, वय, सामर्थ्य, संस्कार, कर्म और मेरे स्मरणसे चित्तकी शुद्धि होती है। इनके द्वारा शुद्ध होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको विहित कर्मोंका आचरण करना चाहिये॥ १४॥ गुरुमुखसे सुनकर भलीभाँति हृदयंगम कर लेनेसे मन्त्रकी और मुझे समर्पित कर देनेसे कर्मकी शुद्धि होती है। उद्धवजी! इस प्रकार देश, काल, पदार्थ, कर्ता, मन्त्र और कर्म—इन छहोंके शुद्ध होनेसे धर्म और अशुद्ध होनेसे अधर्म होता है॥ १५॥ कहीं-कहीं शास्त्रविधिसे गुण दोष हो जाता है और दोष गुण। (जैसे ब्राह्मणके लिये सन्ध्या-वन्दन, गायत्री-जप आदि गुण हैं; परन्तु शूद्रके लिये दोष हैं। और दूध आदिका व्यापार वैश्यके लिये विहित है; परन्तु ब्राह्मणके लिये अत्यन्त निषिद्ध है।) एक ही वस्तुके विषयमें किसीके लिये गुण और किसीके लिये दोषका विधान गुण और दोषोंकी वास्तविकताका खण्डन कर देता है और इससे यह निश्‍चय होता है कि गुण-दोषका यह भेद कल्पित है॥ १६॥ जो लोग पतित हैं, वे पतितोंका-सा आचरण करते हैं तो उन्हें पाप नहीं लगता, जब कि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये वह सर्वथा त्याज्य होता है। जैसे गृहस्थोंके लिये स्वाभाविक होनेके कारण अपनी पत्‍नीका संग पाप नहीं है; परन्तु संन्यासीके लिये घोर पाप है। उद्धवजी! बात तो यह है कि जो नीचे सोया हुआ है, वह गिरेगा कहाँ? वैसे ही जो पहलेसे ही पतित हैं, उनका अब और पतन क्या होगा?॥ १७॥ जिन-जिन दोषों और गुणोंसे मनुष्यका चित्त उपरत हो जाता है, उन्हीं वस्तुओंके बन्धनसे वह मुक्त हो जाता है। मनुष्योंके लिये यह निवृत्तिरूप धर्म ही परम कल्याणका साधन है; क्योंकि यही शोक, मोह और भयको मिटानेवाला है॥ १८॥

पृष्ठ 842

विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः संगस्ततो भवेत्।

संगात्तत्र भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम्॥ १९11.21.19

कलेर्दुर्विषहः क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।

तमसा ग्रस्यते पुंसश्‍चेतना व्यापिनी द्रुतम्॥ २०11.21.20

तया विरहितः साधो जन्तुः शून्याय कल्पते।

ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१11.21.21

विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।

वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्‍वसन्॥ २२11.21.22

पृष्ठ 841

उद्धवजी! विषयोंमें कहीं भी गुणोंका आरोप करनेसे उस वस्तुके प्रति आसक्ति हो जाती है। आसक्ति होनेसे उसे अपने पास रखनेकी कामना हो जाती है और इस कामनाकी पूर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा पड़नेपर लोगोंमें परस्पर कलह होने लगता है॥ १९॥ कलहसे असह्य क्रोधकी उत्पत्ति होती है और क्रोधके समय अपने हित-अहितका बोध नहीं रहता, अज्ञान छा जाता है। इस अज्ञानसे शीघ्र ही मनुष्यकी कार्याकार्यका निर्णय करनेवाली व्यापक चेतनाशक्ति लुप्त हो जाती है॥ २०॥ साधो! चेतनाशक्ति अर्थात् स्मृतिके लुप्त हो जानेपर मनुष्यमें मनुष्यता नहीं रह जाती, पशुता आ जाती है और वह शून्यके समान अस्तित्वहीन हो जाता है। अब उसकी अवस्था वैसी ही हो जाती है, जैसे कोई मूर्च्छित या मुर्दा हो। ऐसी स्थितिमें न तो उसका स्वार्थ बनता है और न तो परमार्थ॥ २१॥ विषयोंका चिन्तन करते-करते वह विषयरूप हो जाता है। उसका जीवन वृक्षोंके समान जड हो जाता है। उसके शरीरमें उसी प्रकार व्यर्थ श्‍वास चलता रहता है, जैसे लुहारकी धौंकनीकी हवा। उसे न अपना ज्ञान रहता है और न किसी दूसरेका। वह सर्वथा आत्म-वञ्चित हो जाता है॥ २२॥✎ 1758

फलश्रुतिरियं नॄणां न श्रेयो रोचनं परम्।

श्रेयोविवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३11.21.23

उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।

आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु॥ २४ 11.21.24

पृष्ठ 843

न तानविदुषः स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।

कथं युञ्ज्यात् पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुधः॥ २५11.21.25

एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धयः।

फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि॥ २६11.21.26

कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः।

अग्‍निमुग्धा धूमतान्ताः स्वं लोकं न विदन्ति ते॥ २७11.21.27

न ते मामंग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।

उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८11.21.28

ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मकाः।

हिंसायां यदि रागः स्याद् यज्ञ एव न चोदना॥ २९11.21.29

हिंसाविहारा ह्यालब्धैः पशुभिः स्वसुखेच्छया।

यजन्ते देवता यज्ञैः पितृभूतपतीन् खलाः॥ ३०11.21.30

पृष्ठ 842

उद्धवजी! यह स्वर्गादिरूप फलका वर्णन करनेवाली श्रुति मनुष्योंके लिये उन-उन लोकोंको परम पुरुषार्थ नहीं बतलाती; परन्तु बहिर्मुख पुरुषोंके लिये अन्तःकरणशुद्धिके द्वारा परम कल्याणमय मोक्षकी विवक्षासे ही कर्मोंमें रुचि उत्पन्‍न करनेके लिये वैसा वर्णन करती है। जैसे बच्चोंसे ओषधिमें रुचि उत्पन्‍न करनेके लिये रोचक वाक्य कहे जाते हैं। (बेटा! प्रेमसे गिलोयका काढ़ा पी लो तो तुम्हारी चोटी बढ़ जायगी)॥ २३॥ इसमें सन्देह नहीं कि संसारके विषय-भोगोंमें, प्राणोंमें और सगे-सम्बन्धियोंमें सभी मनुष्य जन्मसे ही आसक्त हैं और उन वस्तुओंकी आसक्ति उनकी आत्मोन्‍नतिमें बाधक एवं अनर्थका कारण है॥ २४॥ वे अपने परम पुरुषार्थको नहीं जानते, इसलिये स्वर्गादिका जो वर्णन मिलता है, वह ज्यों-का-त्यों सत्य है—ऐसा विश्‍वास करके देवादि योनियोंमें भटकते रहते हैं और फिर वृक्ष आदि योनियोंके घोर अन्धकारमें आ पड़ते हैं। ऐसी अवस्थामें कोई भी विद्वान् अथवा वेद फिरसे उन्हें उन्हीं विषयोंमें क्यों प्रवृत्त करेगा?॥ २५॥ दुर्बुद्धिलोग (कर्मवादी) वेदोंका यह अभिप्राय न समझकर कर्मासक्तिवश पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंका वर्णन देखते हैं और उन्हींको परम फल मानकर भटक जाते हैं। परन्तु वेदवेत्ता लोग श्रुतियोंका ऐसा तात्पर्य नहीं बतलाते॥ २६॥ विषय-वासनाओंमें फँसे हुए दीन-हीन, लोभी पुरुष रंग-बिरंगे पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंको ही सब कुछ समझ बैठते हैं, अग्‍निके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञ-यागादि कर्मोंमें ही मुग्ध हो जाते हैं। उन्हें अन्तमें देवलोक, पितृलोक आदिकी ही प्राप्ति होती है। दूसरी ओर भटक जानेके कारण उन्हें अपने निजधाम आत्मपदका पता नहीं लगता॥ २७॥ प्यारे उद्धव! उनके पास साधना है तो केवल कर्मकी और उसका कोई फल है तो इन्द्रियोंकी तृप्ति। उनकी आँखें धुँधली हो गयी हैं; इसीसे वे यह बात नहीं जानते कि जिससे इस जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं इस जगत‍्के रूपमें है, वह परमात्मा मैं उनके हृदयमें ही हूँ॥ २८॥ यदि हिंसा और उसके फल मांस-भक्षणमें राग ही हो, उसका त्याग न किया जा सकता हो, तो यज्ञमें ही करे—यह परिसंख्या विधि है, स्वाभाविक प्रवृत्तिका संकोच है, सन्ध्यावन्दनादिके समान अपूर्व विधि नहीं है। इस प्रकार मेरे परोक्ष अभिप्रायको न जानकर विषयलोलुप पुरुष हिंसाका खिलवाड़ खेलते हैं और दुष्टतावश अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये वध किये हुए पशुओंके मांससे यज्ञ करके देवता, पितर तथा भूतपतियोंके यजनका ढोंग करते हैं॥ २९-३०॥✎ 1759

स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।

आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक्॥ ३१ 11.21.31

पृष्ठ 844

रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः।

उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम्॥ ३२11.21.32

इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रंस्यामहे दिवि।

तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुलाः॥ ३३11.21.33

एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।

मानिनां चातिस्तब्धानां मद्वार्तापि न रोचते॥ ३४11.21.34

पृष्ठ 843

उद्धवजी! स्वर्गादि परलोक स्वप्नके दृश्योंके समान हैं, वास्तवमें वे असत् हैं, केवल उनकी बातें सुननेमें बहुत मीठी लगती हैं। सकाम पुरुष वहाँके भोगोंके लिये मन-ही-मन अनेकों प्रकारके संकल्प कर लेते हैं और जैसे व्यापारी अधिक लाभकी आशासे मूलधनको भी खो बैठता है, वैसे ही वे सकाम यज्ञोंद्वारा अपने धनका नाश करते हैं॥ ३१॥ वे स्वयं रजोगुण, सत्त्वगुण या तमोगुणमें स्थित रहते हैं और रजोगुणी, सत्त्वगुणी अथवा तमोगुणी इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। वे उन्हीं सामग्रियोंसे उतने ही परिश्रमसे मेरी पूजा नहीं करते॥ ३२॥ वे जब इस प्रकारकी पुष्पिता वाणी—रंग-बिरंगी मीठी-मीठी बातें सुनते हैं कि ‘हमलोग इस लोकमें यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करके स्वर्गमें जायँगे और वहाँ दिव्य आनन्द भोगेंगे, उसके बाद जब फिर हमारा जन्म होगा, तब हम बड़े कुलीन परिवारमें पैदा होंगे, हमारे बड़े-बड़े महल होंगे और हमारा कुटुम्ब बहुत सुखी और बहुत बड़ा होगा’ तब उनका चित्त क्षुब्ध हो जाता है और उन हेकड़ी जतानेवाले घमंडियोंको मेरे सम्बन्धकी बातचीत भी अच्छी नहीं लगती॥ ३३-३४॥

वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।

परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम्॥ ३५11.21.35

शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।

अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६11.21.36

मयोपबृंहितं भूम्‍ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।

भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७11.21.37

पृष्ठ 845

यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।

आकाशाद् घोषवान् प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा॥ ३८11.21.38

छन्दोमयोऽमृतमयः सहस्रपदवीं प्रभुः।

ओंकाराद् व्यञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्तःस्थभूषिताम्॥ ३९11.21.39

विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्‍चतुरुत्तरैः।

अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४०11.21.40

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।✎ 2155

त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद् विराट्॥ ४१ 11.21.41

किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।

इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद् वेद कश्‍चन॥ ४२11.21.42

मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।

एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।

मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३11.21.43

पृष्ठ 844

उद्धवजी! वेदोंमें तीन काण्ड हैं—कर्म, उपासना और ज्ञान। इन तीनों काण्डोंके द्वारा प्रतिपादित विषय है ब्रह्म और आत्माकी एकता, सभी मन्त्र और मन्त्रद्रष्टा ऋषि इस विषयको खोलकर नहीं, गुप्तभावसे बतलाते हैं और मुझे भी इस बातको गुप्तरूपसे कहना ही अभीष्ट है*॥ ३५॥ वेदोंका नाम है शब्दब्रह्म। वे मेरी मूर्ति हैं, इसीसे उनका रहस्य समझना अत्यन्त कठिन है। वह शब्दब्रह्म परा, पश्यन्ती और मध्यमा वाणीके रूपमें प्राण, मन और इन्द्रियमय है। समुद्रके समान सीमारहित और गहरा है। उसकी थाह लगाना अत्यन्त कठिन है। (इसीसे जैमिनि आदि बड़े-बड़े विद्वान् भी उसके तात्पर्यका ठीक-ठीक निर्णय नहीं कर पाते)॥ ३६॥ उद्धव! मैं अनन्तशक्तिसम्पन्‍न एवं स्वयं अनन्त ब्रह्म हूँ। मैंने ही वेदवाणीका विस्तार किया है। जैसे कमलनालमें पतला-सा सूत होता है, वैसे ही वह वेदवाणी प्राणियोंके अन्तः-करणमें अनाहतनादके रूपमें प्रकट होती है॥ ३७॥ भगवान् हिरण्यगर्भ स्वयं वेदमूर्ति एवं अमृतमय हैं। उनकी उपाधि है प्राण और स्वयं अनाहत शब्दके द्वारा ही उनकी अभिव्यक्ति हुई है। जैसे मकड़ी अपने हृदयसे मुखद्वारा जाला उगलती और फिर निगल लेती है, वैसे ही वे स्पर्श आदि वर्णोंका संकल्प करनेवाले मनरूप निमित्तकारणके द्वारा हृदयाकाशसे अनन्त अपार अनेकों मार्गोंवाली वैखरीरूप वेदवाणीको स्वयं ही प्रकट करते हैं और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेते हैं। वह वाणी हृद्गत सूक्ष्म ओंकारके द्वारा अभिव्यक्त स्पर्श (‘क’ से लेकर ‘म’ तक-२५), स्वर ( ‘अ’ से ‘औ’ तक-९), ऊष्मा (श, ष, स, ह) और अन्तःस्थ (य, र, ल, व)—इन वर्णोंसे विभूषित है। उसमें ऐसे छन्द हैं, जिनमें उत्तरोत्तर चार-चार वर्ण बढ़ते जाते हैं और उनके द्वारा विचित्र भाषाके रूपमें वह विस्तृत हुई है॥ ३८—४०॥ (चार-चार अधिक वर्णोंवाले छन्दोंमेंसे कुछ ये हैं—) गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिच्छन्द, अत्यष्टि, अतिजगती और विराट्॥ ४१॥ वह वेदवाणी कर्मकाण्डमें क्या विधान करती है, उपासनाकाण्डमें किन देवताओंका वर्णन करती है और ज्ञानकाण्डमें किन प्रतीतियोंका अनुवाद करके उनमें अनेकों प्रकारके विकल्प करती है—इन बातोंको इस सम्बन्धमें श्रुतिके रहस्यको मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता॥ ४२॥ मैं तुम्हें स्पष्ट बतला देता हूँ, सभी श्रुतियाँ कर्मकाण्डमें मेरा ही विधान करती हैं, उपासनाकाण्डमें उपास्य देवताओंके रूपमें वे मेरा ही वर्णन करती हैं और ज्ञानकाण्डमें आकाशादिरूपसे मुझमें ही अन्य वस्तुओंका आरोप करके उनका निषेध कर देती हैं। सम्पूर्ण श्रुतियोंका बस, इतना ही तात्पर्य है कि वे मेरा आश्रय लेकर मुझमें भेदका आरोप करती हैं, मायामात्र कहकर उसका अनुवाद करती हैं और अन्तमें सबका निषेध करके मुझमें ही शान्त हो जाती हैं और केवल अधिष्ठानरूपसे मैं ही शेष रह जाता हूँ॥ ४३॥✎ 1760 1761 1937 1990

पृष्ठ 845

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः

॥ २१॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    क्योंकि सब लोग इसके अधिकारी नहीं हैं, अन्तःकरण शुद्ध होनेपर ही यह बात समझमें आती है।

    (मुद्रित पृष्ठ 844)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें