श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि।

धातुषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये॥ ६

vedena nāmarūpāṇi viṣamāṇi sameṣvapi|

dhātuṣūddhava kalpyante eteṣāṃ svārthasiddhaye|| 6

अर्थ

प्रिय उद्धव! यद्यपि सबके शरीरोंके पंचभूत समान हैं, फिर भी वेदोंने इनके वर्णाश्रम आदि अलग-अलग नाम और रूप इसलिये बना दिये हैं कि ये अपनी वासना-मूलक प्रवृत्तियोंको संकुचित करके—नियन्त्रित करके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको सिद्ध कर सकें॥ ६॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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