श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

भूम्यम्ब्व‌ग्‍न्यनिलाकाशा भूतानां पंच धातवः।

आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुताः॥ ५

bhūmyambvagnyanilākāśā bhūtānāṃ paṃca dhātavaḥ|

ābrahmasthāvarādīnāṃ śārīrā ātmasaṃyutāḥ|| 5

अर्थ

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंचभूत ही ब्रह्मासे लेकर पर्वत-वृक्षपर्यन्त सभी प्राणियोंके शरीरोंके मूलकारण हैं। इस तरह वे सब शरीरकी दृष्टिसे तो समान हैं ही, सबका आत्मा भी एक ही है॥ ५॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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