श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्।

एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्।

मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति॥ ४३

māṃ vidhatte'bhidhatte māṃ vikalpyāpohyate tvaham|

etāvān sarvavedārthaḥ śabda āsthāya māṃ bhidām|

māyāmātramanūdyānte pratiṣidhya prasīdati|| 43

अर्थ

मैं तुम्हें स्पष्ट बतला देता हूँ, सभी श्रुतियाँ कर्मकाण्डमें मेरा ही विधान करती हैं, उपासनाकाण्डमें उपास्य देवताओंके रूपमें वे मेरा ही वर्णन करती हैं और ज्ञानकाण्डमें आकाशादिरूपसे मुझमें ही अन्य वस्तुओंका आरोप करके उनका निषेध कर देती हैं। सम्पूर्ण श्रुतियोंका बस, इतना ही तात्पर्य है कि वे मेरा आश्रय लेकर मुझमें भेदका आरोप करती हैं, मायामात्र कहकर उसका अनुवाद करती हैं और अन्तमें सबका निषेध करके मुझमें ही शान्त हो जाती हैं और केवल अधिष्ठानरूपसे मैं ही शेष रह जाता हूँ॥ ४३॥✎ 1760 1761 1937 1990

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः

॥ २१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1760 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनन्त-शक्ति-सम्पन्‍न → अनन्त-शक्तिसम्पन्‍न
  • #1761 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मन्त्र-द्रष्टा → मन्त्रद्रष्टा
  • #1937 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अनन्त-शक्ति → अनन्तशक्ति
  • #1990 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मूर्त्ति → मूर्ति

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