श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.42

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।

इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद् वेद कश्‍चन॥ ४२

kiṃ vidhatte kimācaṣṭe kimanūdya vikalpayet|

ityasyā hṛdayaṃ loke nānyo mad veda kaścana|| 42

अर्थ

वह वेदवाणी कर्मकाण्डमें क्या विधान करती है, उपासनाकाण्डमें किन देवताओंका वर्णन करती है और ज्ञानकाण्डमें किन प्रतीतियोंका अनुवाद करके उनमें अनेकों प्रकारके विकल्प करती है—इन बातोंको इस सम्बन्धमें श्रुतिके रहस्यको मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता॥ ४२॥✎ 1760 1761 1937 1990

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1760 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनन्त-शक्ति-सम्पन्‍न → अनन्त-शक्तिसम्पन्‍न
  • #1761 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मन्त्र-द्रष्टा → मन्त्रद्रष्टा
  • #1937 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अनन्त-शक्ति → अनन्तशक्ति
  • #1990 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मूर्त्ति → मूर्ति

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