श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.41

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।✎ 2155

त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्ट्यतिजगद् विराट्॥ ४१

gāyatryuṣṇiganuṣṭup ca bṛhatī paṅktireva ca|

triṣṭubjagatyaticchando hyatyaṣṭyatijagad virāṭ|| 41

अर्थ

(चार-चार अधिक वर्णोंवाले छन्दोंमेंसे कुछ ये हैं—) गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिच्छन्द, अत्यष्टि, अतिजगती और विराट्॥ ४१॥✎ 1760 1761 1937 1990

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #1760 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनन्त-शक्ति-सम्पन्‍न → अनन्त-शक्तिसम्पन्‍न
  • #1761 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मन्त्र-द्रष्टा → मन्त्रद्रष्टा
  • #1937 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अनन्त-शक्ति → अनन्तशक्ति
  • #1990 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मूर्त्ति → मूर्ति
  • #2155 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): गायत्रॺुष्णि → गायत्र्युष्णि

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