श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

रजःसत्त्वतमोनिष्ठा रजःसत्त्वतमोजुषः।

उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन् न तथैव माम्॥ ३२

rajaḥsattvatamoniṣṭhā rajaḥsattvatamojuṣaḥ|

upāsata indramukhyān devādīn na tathaiva mām|| 32

अर्थ

वे स्वयं रजोगुण, सत्त्वगुण या तमोगुणमें स्थित रहते हैं और रजोगुणी, सत्त्वगुणी अथवा तमोगुणी इन्द्रादि देवताओंकी उपासना करते हैं। वे उन्हीं सामग्रियोंसे उतने ही परिश्रमसे मेरी पूजा नहीं करते॥ ३२॥

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