श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।

मानिनां चातिस्तब्धानां मद्वार्तापि न रोचते॥ ३४

evaṃ puṣpitayā vācā vyākṣiptamanasāṃ nṛṇām|

mānināṃ cātistabdhānāṃ madvārtāpi na rocate|| 34

अर्थ

वे जब इस प्रकारकी पुष्पिता वाणी—रंग-बिरंगी मीठी-मीठी बातें सुनते हैं कि ‘हमलोग इस लोकमें यज्ञोंके द्वारा देवताओंका यजन करके स्वर्गमें जायँगे और वहाँ दिव्य आनन्द भोगेंगे, उसके बाद जब फिर हमारा जन्म होगा, तब हम बड़े कुलीन परिवारमें पैदा होंगे, हमारे बड़े-बड़े महल होंगे और हमारा कुटुम्ब बहुत सुखी और बहुत बड़ा होगा’ तब उनका चित्त क्षुब्ध हो जाता है और उन हेकड़ी जतानेवाले घमंडियोंको मेरे सम्बन्धकी बातचीत भी अच्छी नहीं लगती॥ ३३-३४॥

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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