उद्धवजी! विषयोंमें कहीं भी गुणोंका आरोप करनेसे उस वस्तुके प्रति आसक्ति हो जाती है। आसक्ति होनेसे उसे अपने पास रखनेकी कामना हो जाती है और इस कामनाकी पूर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा पड़नेपर लोगोंमें परस्पर कलह होने लगता है॥ १९॥✎ 1758
विषयेषु गुणाध्यासात् पुंसः संगस्ततो भवेत्।
संगात्तत्र भवेत् कामः कामादेव कलिर्नृणाम्॥ १९
उद्धवजी! विषयोंमें कहीं भी गुणोंका आरोप करनेसे उस वस्तुके प्रति आसक्ति हो जाती है। आसक्ति होनेसे उसे अपने पास रखनेकी कामना हो जाती है और इस कामनाकी पूर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा पड़नेपर लोगोंमें परस्पर कलह होने लगता है॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.21.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 842) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)