श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्ततः।

एष धर्मो नृणां क्षेमः शोकमोहभयापहः॥ १८✎ 1227

yato yato nivarteta vimucyeta tatastataḥ|

eṣa dharmo nṛṇāṃ kṣemaḥ śokamohabhayāpahaḥ|| 18

अर्थ

जिन-जिन दोषों और गुणोंसे मनुष्यका चित्त उपरत हो जाता है, उन्हीं वस्तुओंके बन्धनसे वह मुक्त हो जाता है। मनुष्योंके लिये यह निवृत्तिरूप धर्म ही परम कल्याणका साधन है; क्योंकि यही शोक, मोह और भयको मिटानेवाला है॥ १८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1227 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नॄणां → नृणां

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