श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।

औत्पत्तिको गुणः संगो न शयानः पतत्यधः॥ १७

samānakarmācaraṇaṃ patitānāṃ na pātakam|

autpattiko guṇaḥ saṃgo na śayānaḥ patatyadhaḥ|| 17

अर्थ

जो लोग पतित हैं, वे पतितोंका-सा आचरण करते हैं तो उन्हें पाप नहीं लगता, जब कि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये वह सर्वथा त्याज्य होता है। जैसे गृहस्थोंके लिये स्वाभाविक होनेके कारण अपनी पत्‍नीका संग पाप नहीं है; परन्तु संन्यासीके लिये घोर पाप है। उद्धवजी! बात तो यह है कि जो नीचे सोया हुआ है, वह गिरेगा कहाँ? वैसे ही जो पहलेसे ही पतित हैं, उनका अब और पतन क्या होगा?॥ १७॥

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