श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

क्वचिद् गुणोऽपि दोषः स्याद् दोषोऽपि विधिना गुणः।

गुणदोषार्थनियमस्तद्भिदामेव बाधते॥ १६

kvacid guṇo'pi doṣaḥ syād doṣo'pi vidhinā guṇaḥ|

guṇadoṣārthaniyamastadbhidāmeva bādhate|| 16

अर्थ

कहीं-कहीं शास्त्रविधिसे गुण दोष हो जाता है और दोष गुण। (जैसे ब्राह्मणके लिये सन्ध्या-वन्दन, गायत्री-जप आदि गुण हैं; परन्तु शूद्रके लिये दोष हैं। और दूध आदिका व्यापार वैश्यके लिये विहित है; परन्तु ब्राह्मणके लिये अत्यन्त निषिद्ध है।) एक ही वस्तुके विषयमें किसीके लिये गुण और किसीके लिये दोषका विधान गुण और दोषोंकी वास्तविकताका खण्डन कर देता है और इससे यह निश्‍चय होता है कि गुण-दोषका यह भेद कल्पित है॥ १६॥

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