श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

कामिनः कृपणा लुब्धाः पुष्पेषु फलबुद्धयः।

अग्‍निमुग्धा धूमतान्ताः स्वं लोकं न विदन्ति ते॥ २७

kāminaḥ kṛpaṇā lubdhāḥ puṣpeṣu phalabuddhayaḥ|

agnimugdhā dhūmatāntāḥ svaṃ lokaṃ na vidanti te|| 27

अर्थ

विषय-वासनाओंमें फँसे हुए दीन-हीन, लोभी पुरुष रंग-बिरंगे पुष्पोंके समान स्वर्गादि लोकोंको ही सब कुछ समझ बैठते हैं, अग्‍निके द्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञ-यागादि कर्मोंमें ही मुग्ध हो जाते हैं। उन्हें अन्तमें देवलोक, पितृलोक आदिकी ही प्राप्ति होती है। दूसरी ओर भटक जानेके कारण उन्हें अपने निजधाम आत्मपदका पता नहीं लगता॥ २७॥✎ 1759

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1759 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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