भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥✎ 14491450
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तितः।
त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापरः॥ २८
भगवन्! आपकी ही कृपासे जीवोंको ज्ञान होता है और आपकी माया-शक्तिसे ही उनके ज्ञानका नाश होता है। अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाकी विचित्र गति आप ही जानते हैं और कोई नहीं जानता। अतएव आप ही मेरा सन्देह मिटानेमें समर्थ हैं ॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 850) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/22/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1449 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): जीवोंका → जीवोंको
#1450 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भगवान्! → भगवन्!