श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

प्रकृतिः पुरुषश्‍चेति विकल्पः पुरुषर्षभ।

एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः॥ २९

prakṛtiḥ puruṣaśceti vikalpaḥ puruṣarṣabha|

eṣa vaikārikaḥ sargo guṇavyatikarātmakaḥ|| 29

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धवजी! प्रकृति और पुरुष, शरीर और आत्मा—इन दोनोंमें अत्यन्त भेद है। इस प्राकृत जगत‍्में जन्म-मरण एवं वृद्धि-ह्रास आदि विकार लगे ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि यह गुणोंके क्षोभसे ही बना है॥ २९॥✎ 1451

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1451 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृद्धि-ह्रस → वृद्धि-ह्रास

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