श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

उद्धव उवाच

त्वत्तः परावृत्तधियः स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो।

उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च॥ ३४

tvattaḥ parāvṛttadhiyaḥ svakṛtaiḥ karmabhiḥ prabho|

uccāvacān yathā dehān gṛhṇanti visṛjanti ca|| 34

अर्थ

उद्धवजीने पूछा—भगवन्! आपसे विमुख जीव अपने किये हुए पुण्य-पापोंके फलस्वरूप ऊँची-नीची योनियोंमें जाते-आते रहते हैं। अब प्रश्‍न यह है कि व्यापक आत्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाना, अकर्ताका कर्म करना और नित्य-वस्तुका जन्म-मरण कैसे सम्भव है?॥ ३४॥ गोविन्द! जो लोग आत्मज्ञानसे रहित हैं, वे तो इस विषयको ठीक-ठीक सोच भी नहीं सकते। और इस विषयके विद्वान् संसारमें प्रायः मिलते नहीं, क्योंकि सभी लोग आपकी मायाकी भूल-भुलैयामें पड़े हुए हैं। इसलिये आप ही कृपा करके मुझे इसका रहस्य समझाइये॥ ३५॥

यह व्याख्या श्लोक 11.22.34 से 11.22.35 तककी एक साथ है।

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