॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.33
आत्मा परिज्ञानमयो विवादो
ह्यस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।
व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां ✎ 2176
मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३✎ 2176
ātmā parijñānamayo vivādo
hyastīti nāstīti bhidārthaniṣṭhaḥ|
vyartho'pi naivoparameta puṃsāṃ
mattaḥ parāvṛttadhiyāṃ svalokāt|| 33
अर्थ
आत्मा ज्ञानस्वरूप है; उसका इन पदार्थोंसे न तो कोई सम्बन्ध है और न उसमें कोई विवादकी ही बात है! अस्ति-नास्ति (है-नहीं), सगुण-निर्गुण, भाव-अभाव, सत्य-मिथ्या आदि रूपसे जितने भी वाद-विवाद हैं, सबका मूलकारण भेददृष्टि ही है। इसमें सन्देह नहीं कि इस विवादका कोई प्रयोजन नहीं है; यह सर्वथा व्यर्थ है तथापि जो लोग मुझसे—अपने वास्तविक स्वरूपसे विमुख हैं, वे इस विवादसे मुक्त नहीं हो सकते॥ ३३॥