श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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21715.1 5.1 5.1.12 · पृष्ठ 577नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा कृतं / विहन्तुं तनुभृद्विभूयात्॥ १२नैवार्थधर्मैः परतः स्वतो वा / कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात्॥ १२v1 p577: the print ends the verse's line 3 before कृतं
21726.4 6.4 6.4.31 · पृष्ठ 721कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं तस्मै / नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने॥ ३१कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं / तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने॥ ३१v1 p721: the print ends the verse's line 3 before तस्मै
21736.12 6.12 6.12.33 · पृष्ठ 764न्यपातयत् तावदहर्गणेन यो / ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३न्यपातयत् तावदहर्गणेन / यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३v1 p764: the print ends the verse's line 3 before यो
217410.36 10.36 10.36.14 · पृष्ठ 358जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं पुष्पैः / किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४जगाम कृच्छ्रं निर्ऋतेरथ क्षयं / पुष्पैः किरन्तो हरिमीडिरे सुराः॥ १४v2 p358: the print ends the verse's line 3 before पुष्पैः
217510.52 10.52 10.52.37 · पृष्ठ 465श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां / ते निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते / निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम्।v2 p465: the print ends the verse's line 1 after ते
217611.22 11.22 11.22.33 · पृष्ठ 851व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः / परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां / मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३v2 p851: the print ends the verse's line 3 before मत्तः
21773.3 रुषान्ध<tab>:रुषान्धःa tab of the verse's alignment stood between the word and its visarga (the print: रुषान्धः)
21784.4.6 १. २. ३.stray text before the verse; the print's verse begins आब्रह्मघोषोर्जितयज्ञवैशसं
21798.15 8.15 8.15.27 ब्रूहि कारणमेतस्य दुर्धर्षत्वस्य मद्रिपोः। / ओजः सहो बलं तेजो यत एतत्समुद्यमः॥ २७the shloka is printed (v1 p977); the EPUB has only its Hindi
2180PRE.3 प्रभासक्षेत्रमें उद्धवजीके ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये॥ ६०॥ शौनकजी! तब भगवान्‌ने अपनी सारी शक्ति भागवthe Hindi of PRE.3.60-65 (v1 p52), missing in the EPUB, set from the typeset lines
218111.7 मैंने शरीरके भीतर रहनेवाले वायु—प्राणवायुसे यह शिक्षा ग्रहण की है कि जैसे वह आहारमात्रकी इच्छा रखता है और उसकी प्राप्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधककोthe Hindi of 11.7.39-41 (v2 p757), missing in the EPUB, set from the typeset lines
2245POST.4 · पृष्ठ 1008images/v2-p1008-Im0.pngthe drawing of Śrī Kṛṣṇa that closes the book, below ॥ हरिः ॐ तत्सत्॥ at the end of the Mahatmya (v2 p1008), read on the page image 2026-10-19; the EPUB has no image there
2246v1-title · पृष्ठ 226Gita Press's code number of this part, at the head of the title page, flush right, in Helvetica; the EPUB lacks it (R0300). Set before ॥ श्रीहरिः॥ in that line's class: the EPUB has no plain flush-right class. Read on the page image, 2026-10-19
2247v2-title · पृष्ठ 227Gita Press's code number of this part, at the head of the title page (drawn as outlines, no text layer), flush right; the EPUB lacks it. Set before ॥ श्रीहरिः॥ in that line's class. Read on the page image at 100 dpi, 2026-10-19

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