॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.15.27
brūhi kāraṇametasya durdharṣatvasya madripoḥ|
ojaḥ saho balaṃ tejo yata etatsamudyamaḥ|| 27
अर्थ
आप कृपा करके मुझे बतलाइये कि मेरे शत्रुकी इतनी बढ़तीका, जिसे किसी प्रकार भी दबाया नहीं जा सकता, क्या कारण है? इसके शरीर, मन और इन्द्रियोंमें इतना बल और इतना तेज कहाँसे आ गया है कि इसने इतनी बड़ी तैयारी करके चढ़ाई की है’॥ २७॥