श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः।

गुणसंगादुपादत्ते क्‍वचित् कश्‍चिज्जहाति च॥ ४७

etā manorathamayīrhyanyasyoccāvacāstanūḥ|

guṇasaṃgādupādatte kvacit kaścijjahāti ca|| 47

अर्थ

यह शरीर जीवसे भिन्‍न है और ये ऊँची-नीची अवस्थाएँ उसके मनोरथके अनुसार ही हैं; परन्तु वह अज्ञानवश गुणोंके संगसे इन्हें अपनी मानकर भटकने लगता है और कभी-कभी विवेक हो जानेपर इन्हें छोड़ भी देता है॥ ४७॥

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