श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.48

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।

न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः॥ ४८

ātmanaḥ pitṛputrābhyāmanumeyau bhavāpyayau|

na bhavāpyayavastūnāmabhijño dvayalakṣaṇaḥ|| 48

अर्थ

पिताको पुत्रके जन्मसे और पुत्रको पिताकी मृत्युसे अपने-अपने जन्म-मरणका अनुमान कर लेना चाहिये। जन्म-मृत्युसे युक्त देहोंका द्रष्टा जन्म और मृत्युसे युक्त शरीर नहीं है॥ ४८॥

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