श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वांजन्मसंयमौ।

तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक्॥ ४९

tarorbījavipākābhyāṃ yo vidvāṃjanmasaṃyamau|

tarorvilakṣaṇo draṣṭā evaṃ draṣṭā tanoḥ pṛthak|| 49

अर्थ

जैसे जौ-गेहूँ आदिकी फसल बोनेपर उग आती है और पक जानेपर काट दी जाती है, किन्तु जो पुरुष उनके उगने और काटनेका जाननेवाला साक्षी है, वह उनसे सर्वथा पृथक् है; वैसे ही जो शरीर और उसकी अवस्थाओंका साक्षी है, वह शरीरसे सर्वथा पृथक् है॥ ४९॥

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