श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्र्‌यताम्।✎ 975

तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२

labdhvā janmāmaraprārthyaṃ mānuṣyaṃ tad dvijāgryatām|

tadanādṛtya ye svārthaṃ ghnanti yāntyaśubhāṃ gatim|| 22

अर्थ

देवताओंके भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्मको और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण-शरीर प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थका नाश करते हैं, वे अशुभ गतिको प्राप्त होते हैं॥ २२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #975 शब्दोंके बीचका स्थान: द्विजाग्र् यताम्। → द्विजाग्र्‌यताम्।

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