श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।

द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३

svargāpavargayordvāraṃ prāpya lokamimaṃ pumān|

draviṇe ko'nuṣajjeta martyo'narthasya dhāmani|| 23

अर्थ

यह मनुष्य-शरीर मोक्ष और स्वर्गका द्वार है, इसको पाकर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् मनुष्य है जो अनर्थोंके धाम धनके चक्करमें फँसा रहे॥ २३॥

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