श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.60

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।

मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥ ६०

sukhaduḥkhaprado nānyaḥ puruṣasyātmavibhramaḥ|

mitrodāsīnaripavaḥ saṃsārastamasaḥ kṛtaḥ|| 60

अर्थ

उद्धवजी! इस संसारमें मनुष्यको कोई दूसरा सुख या दुःख नहीं देता, यह तो उसके चित्तका भ्रममात्र है। यह सारा संसार और इसके भीतर मित्र, उदासीन और शत्रुके भेद अज्ञानकल्पित हैं॥ ६०॥

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