श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.61

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।

मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः॥ ६१

tasmāt sarvātmanā tāta nigṛhāṇa mano dhiyā|

mayyāveśitayā yukta etāvān yogasaṃgrahaḥ|| 61

अर्थ

इसलिये प्यारे उद्धव! अपनी वृत्तियोंको मुझमें तन्मय कर दो और इस प्रकार अपनी सारी शक्ति लगाकर मनको वशमें कर लो और फिर मुझमें ही नित्ययुक्त होकर स्थित हो जाओ। बस, सारे योगसाधनका इतना ही सार-संग्रह है॥ ६१॥

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