श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

दुःशीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवाः।

दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥ ८

duḥśīlasya kadaryasya druhyante putrabāndhavāḥ|

dārā duhitaro bhṛtyā viṣaṇṇā nācaran priyam|| 8

अर्थ

उसकी कृपणता और बुरे स्वभावके कारण उसके बेटे-बेटी, भाई-बन्धु, नौकर-चाकर और पत्‍नी आदि सभी दुःखी रहते और मन-ही-मन उसका अनिष्टचिन्तन किया करते थे। कोई भी उसके मनको प्रिय लगनेवाला व्यवहार नहीं करता था॥ ८॥

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