श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः।

धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधुः पंचभागिनः॥ ९

tasyaivaṃ yakṣavittasya cyutasyobhayalokataḥ|

dharmakāmavihīnasya cukrudhuḥ paṃcabhāginaḥ|| 9

अर्थ

वह लोक-परलोक दोनोंसे ही गिर गया था। बस, यक्षोंके समान धनकी रखवाली करता रहता था। उस धनसे वह न तो धर्म कमाता था और न भोग ही भोगता था। बहुत दिनोंतक इस प्रकार जीवन बितानेसे उसपर पंचमहायज्ञके भागी देवता बिगड़ उठे॥ ९॥

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