॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.25.6
सन्निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।
व्यवहारः सन्निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः॥ ६
sannipātastvahamiti mametyuddhava yā matiḥ|
vyavahāraḥ sannipāto manomātrendriyāsubhiḥ|| 6
अर्थ
उद्धवजी! ‘मैं हूँ और यह मेरा है’ इस प्रकारकी बुद्धिमें तीनों गुणोंका मिश्रण है। जिन मन, शब्दादि विषय, इन्द्रिय और प्राणोंके कारण पूर्वोक्त वृत्तियोंका उदय होता है, वे सब-के-सब सात्त्विक, राजस और तामस हैं॥ ६॥