श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

सेवतो वर्षपूगान् मे उर्वश्या अधरासवम्।

न तृप्यत्यात्मभूः कामो वह्निराहुतिभिर्यथा॥ १४

sevato varṣapūgān me urvaśyā adharāsavam|

na tṛpyatyātmabhūḥ kāmo vahnirāhutibhiryathā|| 14

अर्थ

मैं वर्षोंतक उर्वशीके होठोंकी मादक मदिरा पीता रहा, पर मेरी कामवासना तृप्त न हुई। सच है, कहीं आहुतियोंसे अग्‍निकी तृप्ति हुई है॥ १४॥

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