पुंश्चल्यापहृतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभुः।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्॥ १५
puṃścalyāpahṛtaṃ cittaṃ ko nvanyo mocituṃ prabhuḥ|
ātmārāmeśvaramṛte bhagavantamadhokṣajam|| 15
अर्थ
उस कुलटाने मेरा चित्त चुरा लिया। आत्माराम जीवन्मुक्तोंके स्वामी इन्द्रियातीत भगवान्को छोड़कर और ऐसा कौन है, जो मुझे उसके फंदेसे निकाल सके॥ १५॥
पुंश्चल्यापहृतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभुः।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्॥ १५
उस कुलटाने मेरा चित्त चुरा लिया। आत्माराम जीवन्मुक्तोंके स्वामी इन्द्रियातीत भगवान्को छोड़कर और ऐसा कौन है, जो मुझे उसके फंदेसे निकाल सके॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 872) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/26/15/