श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतसः।

रज्जुस्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रियः॥ १७

kimetayā no'pakṛtaṃ rajjvā vā sarpacetasaḥ|

rajjusvarūpāviduṣo yo'haṃ yadajitendriyaḥ|| 17

अर्थ

जो रस्सीके स्वरूपको न जानकर उसमें सर्पकी कल्पना कर रहा है और दुखी हो रहा है, रस्सीने उसका क्या बिगाड़ा है? इसी प्रकार इस उर्वशीने भी हमारा क्या बिगाड़ा? क्योंकि स्वयं मैं ही अजितेन्द्रिय होनेके कारण अपराधी हूँ॥ १७॥

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