॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.26.21
त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ।
विण्मूत्रपूये रमतां कृमीणां कियदन्तरम्॥ २१
tvaṅmāṃsarudhirasnāyumedomajjāsthisaṃhatau|
viṇmūtrapūye ramatāṃ kṛmīṇāṃ kiyadantaram|| 21
अर्थ
यह शरीर त्वचा, मांस, रुधिर, स्नायु, मेदा, मज्जा और हड्डियोंका ढेर और मल-मूत्र तथा पीबसे भरा हुआ है। यदि मनुष्य इसमें रमता है तो मल-मूत्रके कीड़ोंमें और उसमें अन्तर ही क्या है॥ २१॥