श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तस्मिन् कलेवरेऽमेध्ये तुच्छनिष्ठे विषज्जते।

अहो सुभद्रं सुनसं सुस्मितं च मुखं स्त्रियः॥ २०

tasmin kalevare'medhye tucchaniṣṭhe viṣajjate|

aho subhadraṃ sunasaṃ susmitaṃ ca mukhaṃ striyaḥ|| 20

अर्थ

यह शरीर मल-मूत्रसे भरा हुआ अत्यन्त अपवित्र है। इसका अन्त यही है कि पक्षी खाकर विष्ठा कर दें, इसके सड़ जानेपर इसमें कीड़े पड़ जायँ अथवा जला देनेपर यह राखका ढेर हो जाय। ऐसे शरीरपर लोग लट्टू हो जाते हैं और कहने लगते हैं—‘अहो! इस स्त्रीका मुखड़ा कितना सुन्दर है! नाक कितनी सुघड़ है और मन्द-मन्द मुसकान कितनी मनोहर है॥ २०॥

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