pitroḥ kiṃ svaṃ nu bhāryāyāḥ svāmino'gneḥ śvagṛdhrayoḥ|
kimātmanaḥ kiṃ suhṛdāmiti yo nāvasīyate|| 19
अर्थ
यह शरीर माता-पिताका सर्वस्व है अथवा पत्नीकी सम्पत्ति? यह स्वामीकी मोल ली हुई वस्तु है, आगका ईंधन है अथवा कुत्ते और गीधोंका भोजन? इसे अपना कहें अथवा सुहृद्-सम्बन्धियोंका? बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई निश्चय नहीं होता॥ १९॥
पित्रोः किं स्वं नु भार्यायाः स्वामिनोऽग्नेः श्वगृध्रयोः।
किमात्मनः किं सुहृदामिति यो नावसीयते॥ १९
यह शरीर माता-पिताका सर्वस्व है अथवा पत्नीकी सम्पत्ति? यह स्वामीकी मोल ली हुई वस्तु है, आगका ईंधन है अथवा कुत्ते और गीधोंका भोजन? इसे अपना कहें अथवा सुहृद्-सम्बन्धियोंका? बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई निश्चय नहीं होता॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 873) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/26/19/