श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अदृष्टादश्रुताद् भावान्‍न भाव उपजायते।

असम्प्रयुंजतः प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मनः॥ २३

adṛṣṭādaśrutād bhāvānna bhāva upajāyate|

asamprayuṃjataḥ prāṇān śāmyati stimitaṃ manaḥ|| 23

अर्थ

जो वस्तु कभी देखी या सुनी नहीं गयी है, उसके लिये मनमें विकार नहीं होता। जो लोग विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग नहीं होने देते, उनका मन अपने-आप निश्‍चल होकर शान्त हो जाता है॥ २३॥

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