जो वस्तु कभी देखी या सुनी नहीं गयी है, उसके लिये मनमें विकार नहीं होता। जो लोग विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग नहीं होने देते, उनका मन अपने-आप निश्चल होकर शान्त हो जाता है॥ २३॥
अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते।
असम्प्रयुंजतः प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मनः॥ २३
जो वस्तु कभी देखी या सुनी नहीं गयी है, उसके लिये मनमें विकार नहीं होता। जो लोग विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग नहीं होने देते, उनका मन अपने-आप निश्चल होकर शान्त हो जाता है॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.26.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 873) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/26/23/