॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.26.24
तस्मात् संगो न कर्तव्यः स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियैः।
विदुषां चाप्यविश्रब्धः षड्वर्गः किमु मादृशाम्॥ २४
tasmāt saṃgo na kartavyaḥ strīṣu straiṇeṣu cendriyaiḥ|
viduṣāṃ cāpyaviśrabdhaḥ ṣaḍvargaḥ kimu mādṛśām|| 24
अर्थ
अतः वाणी, कान और मन आदि इन्द्रियोंसे स्त्रियों और स्त्रीलम्पटोंका संग कभी नहीं करना चाहिये। मेरे-जैसे लोगोंकी तो बात ही क्या, बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी अपनी इन्द्रियाँ और मन विश्वसनीय नहीं हैं॥ २४॥