श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.26.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

तस्मात् संगो न कर्तव्यः स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियैः।

विदुषां चाप्यविश्रब्धः षड्वर्गः किमु मादृशाम्॥ २४

tasmāt saṃgo na kartavyaḥ strīṣu straiṇeṣu cendriyaiḥ|

viduṣāṃ cāpyaviśrabdhaḥ ṣaḍvargaḥ kimu mādṛśām|| 24

अर्थ

अतः वाणी, कान और मन आदि इन्द्रियोंसे स्त्रियों और स्त्रीलम्पटोंका संग कभी नहीं करना चाहिये। मेरे-जैसे लोगोंकी तो बात ही क्या, बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी अपनी इन्द्रियाँ और मन विश्‍वसनीय नहीं हैं॥ २४॥

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